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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- ‘तिपे भोम्हरा मा लइका ला काबर रेंगाए, झांझ भोला धर लिही गोंदली ला नी धराए’


फरिया ला फिजो अउ बने अंगोछा खाए पिये के धियान राख अउ छैइहां मा दिन चढ़ती के बेरा राखे रेहे के उदिम करत राह. चुटुर पुटुर खाई खजेना डाहर मन झन डोलय काबर के पेट मा घलाव डंठाई जाना चाही कमइया के काहे कमाए बिना कइसे चलही जिनगी तभो ले नान्हे लइका ला अपन मया के छैइहां के संगे संग धरती मइया के कोरा के छैइंहा मा रहना अउ बने दिन के नियाव मा पासंग असन भड़ाए राख.

गोंदली मा को जानी का असर हे

गोंदली के असर ला जानना हे ते है खखउरी मा दाबके थोकन देर राख के देख देह तिप जाही अउ बुखार असन जनाए लागही. हमर सियान अउ पुरखा पईत ले चलत आवत टोटका ला घलाव आजमाना चाही. विज्ञान के लिए असर ला भुलाए नइ जावय बस ओला नवा – नवा बनाके चलना चाही.

रतिहा जें खाके बोरे सकेले

भात ला बासी बनाए बर रतिहा कुन पानी डारके राखे रिहिस तौने होगे बासी. एमा सीतलता के संगे संग नून मिरचा अउ दही मही संग बड़ मजा आथे. ताते तात खाए अउ रतिहा ले बने सुख ला चिन्हाए. जिनगी मा हमर किसानी के आधार हे अऊ इकरे सेती खान पान मा बासी नइते बोरे के चलन सदा दिन ले चलत आवत हे.

लइका होवय के सियान धरे राहव धियान

उतरती घाम भारी जिमानथे तभे तो लहकत आवत बनिहार, मजदूर, किसान के संगे संग लइकामन ला घलाव धियान देवत चलना परही तभे ये तिपे भोम्हरा ले शिक्षा के संगे संग देश दुनिया बर खाए धरे के बेवस्था जम पाही. पूरा परिवार सुखी राहय बस मौसम के असर ला जानव.

(मीर अली मीर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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