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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- कथरी ल आजी दाई काबर कथन?


फेर चली देबो त वोकर सबो अलहन ह हमी मन ल झेले बर परही. चद्दर ह बिना सोचे बिचारे पोतनी करा गोठियावत रीहिसे. वो ए बात ल बिसर डरिस कि एक दिन महूं ह डोकरा होहूं ताहन पोतनी ह मोला डोकरा होगे कहिके देखे सुने बर आय बर छोड़ दिही. जब तक के चद्दर के पसिया ह नइ ढरे राहय तब तक ले कड़कड़-कड़कड़ करत रहीथे. पोतनी ह लइकई मति म अपन ददा ल पूछथे. कथरी ल आजी दाई काबर कथन गा?

चद्दर ह अपन बेटी पोतनी ल अंगाकर रोटी अउ चाहा खवावत-पियावत कथे-सुन बेटी लुगरा सियान होथे ताहन वोला बूढ़त काल म कथरी बना दे जाथे. जब तंय ससुरार जाबे ओकर बाद तोर लोग लइका आही ताहन उमन पोतनी हो जाही, तंय ह लुगरा हो जाबे अउ तोर दाई ह कथरी हो जाही. पोतनी कथे-त ददा तंय सियान हो जाबे ताहने कथरा बन जाबे न. हव बेटी कथरा तो बन जाहूं फेर लिपे के काम आवं न पोते के काम आवं.

माइलोगिन मन ह मइके ले लुुगरा पहिर के ससुरार जाथे ताहन उहां वोकर नान- नान पोतनी होथे, अउ लुगरा ह सियान होथे ताहन कथरी बन जाथे. लुगरा मन ल एक जगा सकेल के सूजी सूत ह डोकरी पुरायन कहवावत रहीथे. इही कथरी मन नवा पीढ़ी ल अपन देह म लुका के जिनगी के दुख पीरा ल बतावत रहीथे. लइका कथे-ददा आगू जइसे कथरी आजी दाई ह जादा नजर म आवय नही. चद्दर ह समझाथे देख बेटी कथरी के अंगना म जब ले डिस्को जइसे रंग बिरंग के साल उतरिस उही किसम ले परिवार नियोजन ह उतरीस. जऊन किसम ले साल ह कतको लुगरा ल कथरी नइ बनन देवय, उही किसम ले परिवार नियोजन ह घलो कतको लुगरा ल आजी दाई नइ बनन देवय. काबर कि हम दू हमर दू. छोटे परिवार सुखी संसार ह लुगरा लमाए के अंछरा ल सकेल देथे. आगू जमाना म दस बारा झिन लोग-लइका राहय वोमा एक न एक झन नोनी अवश्य राहय तभे तो सब झिन ल आजी दाई बने के सुभाग मिलय. फेर अभी मान ले एक झन लइका म परिवार नियोजन करवाबे त जादा पइसा, अउ दू झिन म आपरेशन करवाबे ते थोकिन कम अउ तीन झन म बंद करवाबे त थोकिन अउ कम. पइसा के लालच म एक झिन लइका म आपरेशन करा लेथन. जेकर कम से कम एक झिक नोनी रहीथे उही ह आगू चल के भविष्य म आजी दाई बन सकथे, नइ ते कतको अभागिन मन के आजी दाई बने के सपना ह जिनगी भर पूरा नइ होवन पाय. वइसे भी नोनी मन ल लक्ष्मी माने गे हे. बुजुर्ग मन कन्यादान ल महादान हरे कइथे. अतेक बड़े बड़े दृष्टांत के बावजूद घलो ससुरार म लुगरा ह बने दान-दाहिज नइ लेगिस ते वोला मुरकेट के गुड़री बना डरथे. कतको सुंदर लुगरा ल ससुरार वाले मन अपन अतियाचार ले चेंदरी घलो बना डरथे. कभु-कभु जादा ममता वाले लुगरा ह अपन लइका के खातिर अपन देहे ल चीर के जुनहा बन जथे. तब बिना जीव वाले के अतका समझ हे त मानुस जइसे जीवधारी मन तो अउ जादा गुनत होही.

पोतनी ह फेर तोतरावत कथे-त जेकर तुरा-तुरा रथे तउन ह आजी दाई नइ बन सकय ग ? हव बेटी पोतनी, काबर वो ह कन्यादान ल जानय नही तेकर सेती आजी दाई बने के पात्र नइ रहय. अइसन मन ह डोकरी दाई के नाम से नेम प्लेट बनाथे. मात्र डोकरी दाई के डिगरी धारी मन सिरीफ लुगरा लाय ल जानथे. लुगरा देय ल न जानय. ए जग म लेवई-देवई बराबर होथे तभे बनथे. अइसन परिस्थिति म डोकरी दाई ह लुगरा रूपी बहू ल आजी दाई बनाये बर पूजा पाठ करत रईथे. वइसे लुगरा ल त्याग के मुरती माने गे हे. वइसे आजकल के लुगरा मन डोकरी दाई बने के जादा साध मरथे. आजी दाई के सपना बहुत कम माईलोगिन मन देखथे. काबर कि आजी दाई बनई मने हिरदे म पखरा रखई हरे. आजी दाई बने के पहिली अपन पोतनी ल जवान लुगरा बना के बिदा करे बर परथे. जऊन लुगरा ह आजी दाई अउ डोकरी दाई के दुनो सुख ल भोगथे ते ओकर मन ह मया देख के मरे बर नइ लागय जनमो जनम जिये के मन करथे. अइसन लुगरा ह तो बड़ भागमानी होथे फेर जऊन ह सिरिफ आजी दाई रथे वो ह डोकरी दाई होय के सपना देखथे जऊन डोकरी दाई रथे वो ह आजी दाई होय के सपना देखथे. कोनो ह कोनो म संतोस नइ हे. जब मानुष के मन म संतोष धन आ जथे तब तो फेर सबो धन ह धुर्रा के बरोबर हो जथे.

वइसे जउन मया आजी दाई ह अपन बेटी के पोतनी-पोतना मन ल देथे वोतका मया डोकरी दाई ह अपन नाती-नतरा ल नइ दे पावय. काबर कि चारो घड़ी उंकरे संग पहाए रहिथे. कतको डोकरी दाई मन के जिनगी ह जइसे-जइसे कटथे ओइसने-ओइसने बहू ह मुंहु ल एकंगू करथे. वोती नाती नतरा मन कचरा समझथे. तब डोकरी दाई ल आजी दाई बने के सुरता आथे. तेकर ले तो बेटीच्च बने हरे. कम से कम एक लोटा पानी ल तो दिही अऊ वोकर पोतनी ह कथरी ल बने खुटिया के लीप डारही. लुगरा ह अपन दाई ल चुरेना बोर के माटी राख म चुकचुक ले उजरा डारही. जतका जतन लुगरा करथे वोतका जतन बिहाव के बाद चद्दर ह नइ कर पावय. काबर कि बिहाव के बाद तो चद्दर ह लुगरा के जतन म लग जाथे. डोकरी दाई ह सियान होथे कहूं वोला डोकरी किबे ते वोकर मइन्ता भोगा जथे. खिसिया के कथे- का तहू मन डोकरा-डोकरी नइ होहू तेमा मोला डोकरी काहत हव. डोकरी ल डोकरी कहिबे नइ, त का मोटियारी ल कहिबे ? फेर धन हे आजी दाई अऊ डोकरी दाई मन घलो बूढ़त काल म मोटियारी बने के साध करथे. बने-बने चिक्कन-चिक्कन पाटी पारही. उलटा-पुलटा के पहिरहीं. हमर परोसीन जऊन ह डोकरी दाई अऊ आजी दाई के पद म बिराजे हे तउन ल मंय ह देखा सिखी आंटी कहि पारेंव वोहर मोर बर बगिया गे. मंय ह तोला आंटी दिखथंव तेमा ? भउजी नइ कहि सकस. त भइया ह अंकल होगे त तोला आंटी नइ कहूं त तोला भउजी कहूं तेहा फबही. फेर कतेक उमर ले भउजी रहिबे, जतके बूढ़ावत जाबे वोतके तोर जवानी चढ़त जाही.

वो दिन तो आंटी मोर बर बाहरी मुठिया धर के दउंड़ गे रीहिस. मंय गुनेव एक जगा रहि के काबर साम्प्रदायिक दंगा करहूं, तेकर ले आंटी ल भउजी केहे म मोर का जाही. बिहान दिन बिहनिया ले सूत उठ के मउका देख के आंटी ल केहेंव- कइसे भउजी, भइया ह कहां हे ? चार झोक के सुनउक म गोहार पार के आंटी ल भउजी केहेंव ताहन का कहिबे वोकर खुशी ल… भउजी ह मोला बला के खारा-मीठा चाय पानी खवइस-पियइस. वो दिन ले आंटी मगन अऊ महूं मगन. आज काल तो जइसन-जइसन देवी-देवता वोइसन-वोइसन पूजा पाठ करके खारा मीठा झेलव. जऊन किसम ले मंय ह झड़कत हवं. चाहे वो ह आजी दाई होवय, चाहे डोकरी दाई, वोला भउजी केहे म न पइसा लागे न कउड़ी, खरचा होवय न मुंहु पिराय, एकर ले आपसी मैतरी अउ सद्भाव ह घलो बने रहिथे. जउन बात के आज हमर देस ल बहूते जरूरत हे.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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