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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- कउंवा, कबूतर अउ मनखे


काबर के मनखे ओ सबके, भोगी जीव हे. कोनो एक चीज खंग जाही तब ओकर जीव हर उकता जाही, चटपट करही, इही सोच के ओहर सब एक एक ठन के रचना करे हे. मनखे, भोगी, कामी, रसिक, प्रेमी, क्रोधी, दयालु सबे होथे. सबके अलग-अलग गुन. जइसे बाप अपन लइका मन ला उकर गुन अउ लक्षण ल देख के विही-विही विषय के शाला में भरती करथे, जिहां ओला जादा सफलता मिले के आशा रथे. अब जौन बेटा के रुचि तबला, ढोलक, हारमोनियम मं हे ओला कहूं विज्ञान के विषय मं भरती कर दिही तब ओकर का खाक दिमाग लगही. बस वइसने बरम्हा घला सबके बेवस्था कर देहे. जउन कामी हे तेकर बर सुंदर नारी, भोगी हे तेकर बर विलास के कतको साधन, शराब, भांग गांजा.

सब ठीक हे, अपन-अपन जगह मं फेर ये चिरई-चुरगुन के मनखे के जीवन से का संबंध? वाह, कइसे नइहे अतके तो समझ के फेर हे न. संझा, बाग-बगीचा कोती जाव देखव कइसन चिरई मन झाड़-झरोखा मं बइठके चहचहावत रथे. दिन भर के थके मांदे रथे तभो ले ओकर मुंह के बोली मन ल भा जथे. इकरे ऊपर एक ठन ददरिया के सुरता आगे-
‘झूल बांसुरी, झूल बांसुरी
तोर से कांही ल नइ मांगौ रे
मैं तोर बोली के भूखे हौं रे
अउ सुनिहौ तो लौ सुनौ-
जंगल झाड़ी दीखे ल हरियर
मोटर वाला नइ दीखे बदे हौं नरियर
नवा सड़किया रेंगे ले महीना
दू दिन के अवइया लगाए महीना.’

बोली सब बोलथे. सब करा दू ठन हाथ, दूू ठन गोड़, मुंह कान हे. फेर, फेर का अतके मं तो तमाशा होथे. ककरो बात हर तलवार मारे असन लगथे तब कतको अतेक परेम लगा के बोलथे ते ओकर बइरी हर घला ओला बइरी नहीं हितवा असन लागथे. कतको झन ल तो देखके अइसे लागथे के फूटे आंखी नइ सुहावय. सब मुंह के खेल हे. विही मुंह आथे अउ विही मुंह जाथे. चिरई चुरगुन तो ये मनखे मन ले अघाते सुंदर सुहाथे. जब मन पहाड़ हो जथे, दुख सहे नइ जाय, तब ओहर अपन तीर-तार ल झांक के देखथे. फेर कांही मं ओकर मन नइ रमय. तब घर मं कबूतर पाले रथे तउन चिरई मन घुटूर-घंू-घुटूर-घंू करत येती-तेती फुदकत रथे.

बिसवंतिन खटिया मं बइठे आंसू ढारत रथे. एक ठन कबूतर अतके बेर उड़ावत ओकर गोदी मं जाके गिरगे अउ अपन बोली मं पूछथे- दीदी तोर आंखी मं आंसू?
-नहीं रे आंसू थोड़े हे, ये तो पानी हे पानी?
– पानी अउ आंसू मं का अंतर होथे दीदी?
-पानी कुंआ, नंदिया अउ तरिया मं मिलथे, अउ उहें ले लानथन.
– तब तो ये आंसू दूसर चीज हे ना? देख दीदी तैं मोर से छुपावत हस. मोला बता का तोला भइया मारिसे, ते कोनो तोला दुख देवत हे. एक महीना ससुराल आय नइ होये हे अउ आंखी मां तोर आंसू?
-काला बतावंव रे कबूतर भाई, मनखे के सुख-दुख ओकर करम किस्मत के बात होथे. ओला न कोनो टार सकय न मेट सकय. ओहर कबूतर ल समझावत कहीथे-
‘कुछ करनी कुछ करम गति
कुछ पुरबल के भाग
जाम्बुक तो ऐसा कहे
तू का कहे रे काग.’

संबंध ककरो संग अपने-अपन बने नहीं, बनाय जाथे. कहां चिरई-चिरगुन अउ कहां मनखे. कतेक सुग्घर वार्तालाप. अतका पन तो मनखे मनखे संग नइ गोठियावत होही. वाजिब मं अपने जाति, समाज, मनखे,धरम अउ देश अतेक नइ सुहावय जतेक दूसर सुहाथे. धन विधाता के अइसने नियम हे तै जानसुन के मनखे मन अइसने करथे. वोला विही मन जानै. जब मनखे या तो अपन संबंध ल खराब कर डारथे या फेर कोनो जानसुन के कन्नी काटे ले धरथे तब ओहर सब बात ला समझ जाथे. ओहर फेर दूसर रस्ता कोती रेंगे ले धरथे. मनखे ल जीना हे तब तो ककरो संग न ककरो संग तो ओला संबंध बनायेच ले परिही. ये तीर देखो संबंध, परेम कइसे जुरथे, बनथे तौन ला-
बालू के डोकरी दाई एक दिन बिहनिया टठिया-बर्तन मांजत राहय. अतके बेर छानही मं आके कउंवा कांव-कांव करे लगिस. बर्तन ला मांजत राहै तउन ओ दाई के धियान छानही कोती चल दिस अउ ओहर कउंवा ला पूछथे- ‘कस रे कउंवा, ओ दिन तो मैं मोर मइके ले आये हौं. फेर का संदेश लाय हस.’

ये साल ओकर ददा खतम होगे. अब मइके मं भाई-भौजी भतीजा के छोड़े ओकर अउ कोनो नइहे. दया-मया अउ सुख-दुख के दाई-ददा के ये जीवन भर गै. भाई-भौजी हे तौन मन अपन ल देखही, हियाब करही धन मोला देखहीं. मने मन गुनत सामबती के आंसू डबडबागे. कउंवा फेर कांव-कांव करथे. तब फेर ओहर पूछथे- ‘का कोनो सगा अवइया हे रे. बने बता न कोन देश-देशांतर ले तैंहर आवत हस अउ का संदेश लाय हस तौंन ला बता न भई?’

कउंवा कुछु नइ बोलय. बालू के डोकरी दाई बर्तन ल धो-मांज के भितिरिया देथे अउ पठेरा मं अंगाकर रोटी माढ़े रथे तेमा के एक ठन टुकड़ा अंगना मं मढ़ा देथे. ओहर अपन दूसर-काम मं लग जथे. कउंवा आथे अउ रोटी ल झपटे असन धर के भाग जाथे. बहुत दूरिहा कोन जनी कोन कोती.

अपन घर मं बंधाय गाय, भइस, बइला, बछरू, अउ चिरई-चुरगुन मन संग गोठियाय ले वाजिब मं मन कतको भारी राहय, चाहे सिर ऊपर पहाड़ पटकाय राहय. ओकर मेर जाके थोकन पुचकार तो ले, देख कइसे गइया अपन बेटा ले जइसे पूछी मं मार के दुलार करथें, मनखे मन ला घला ओहर ओतेके मन चाहथे. कतको झन घर-गोसाइयां अतेक होथे ते उन घर के गाय-भइंस ला घला दूह डरथे. नहीं ते होथे का, राउत बिगन ओ गाय-भइस मन कोनो ला तीर मं ओधन नइ दै. ये सब का अइसने हो जाथे? नहीं… संबंध बनाय ले पड़थे. जब तहीं कोनो ला मुंह बात नइ देबे तब तोला कोन कुकुर दिही.

अउ हां, देख एक ठन जिनिस के तो सुरता भुलावत हे. मिट्ठू तो घला देखे ले मिलथे. घर मं ओला सब झन मिट्ठू-मिट्ठू कहि-कहि के पुचकारत रहिथे. कोनो घर मं लइका मन ओला दूध-भात देथें तब कोनो लाली मिरचा. अब कोनो कइहीं, देख तो देख लाली मिरचा देवत हे बपरा मिट्ठू ला. तब सियान मन के ये धारना हे के जतके ओहर जादा लाली मिरचा खाथे ओतके सुग्घर ओकर मुंह ले रसगुल्ला बरोबर बोली निकलथे.

मीठू के बोली- वाजिब मं सुहाथे घला. अब्बड़ नीक लागथे. घर मं कोनो अनजान मनखे आ जाथे तब ओहर अपने बोली मं कथे- दीदी, सगा आवथे, पानी निकाल के दे, बइठइया आवथे, पिड़हा निकाल दे. ये मिट्टू सब झन संग गोठियाही चाहे लईका होय, चाहे सियान, दू भाखा जरूर ओमन ला मुंह देही. डोकरी दाई तो ओला संझा-बिहनिया ‘सीताराम-सीताराम काह रे मिट्ठू’ के पाठ पढ़ावत रथे. मिट्ठू घला ओकर संगे-संग पढ़त रथे- सीताराम-सीताराम. चिरई-चिरगुन मन अतेक सुग्घर बतियाथें, गोठियाथे, तब मनखे के मुंह मं का अतेक कीरा पर गेहे के ओमन अपने ल फूटे आंखी नइ सुहावय. उन तो अउ उल्टा के भाई के खून के पियासे होगे हें. कुछ तो येकर मन तीर ले सीखौ, का ये चिरई-चिरगुन मन ले घला ‘मनखे के जात’ गे-गुजरे हे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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