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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- जीवलेवा घाम, गरमी ल तो देख के मनखे के चारों कोना चित्त


ये घाम के मारे ककरो माथा पिरावथे, कोनो खटिया धरे हे. ऊंच-नीच खाना-पीना अउ गांव के हिसाब-किताब ल तो जानबे करत हन, न तरिया नदिया के सफाई न तोर कुंआ के. जइसने पाथे घर के मंडलीन मन वइसने हर्रस भर्रस निकाल के पानी लावत हे. विही ला तहां ले सब पीये खाय अउ बउरथे. मइलहा पानी ल बने फरियावन देतीन त भरतीन. अरे इहां पानी के दुकाल हे तब आगू पाछू ल कोन देखथे. जौने मिल गे तउने बहुत हे अउ ये गरमी के महीना मं ओला अमरीत जान अमरीत. कस कका, लू काला कथे, ओ दिन तरिया मं नहावत रहेन त गजाधर अउ सीताराम गोठियावत रहिन हे लू मं कहां-कहां के गजब आदमी मरगे कहिके? दुकालू ह बिशेसर ल पूछथे.

तहूं कहां रेहे रे लेडग़ा, लू काला कथे तौन ला आज ले नइ जानस? अरे इही जीवलेवा घाम हर तो लू आय. जइसे डॉक्टर, बइद के मन थर्मामीटर मं कतेक बुखार आगहे कहि के बीमरहा शरीर ल नापथे तइसने बारहों महीने के सरद गरम के नाप जोख करे बर एक ठन मौसम विभाग होथे तौन जनता ल ये जानकारी देथे कि अतका अतका आज शरद-गरम मौसम हा रहिसे.

ये जीवलेवा घाम म मनखे तो मनखे जानवर अउ चिरई-चिरगुन के बारा हाल हो जाथे. ओमन ल न खोजे मं पानी मिलए न हरियर घास, कइसे करके ओमन अपन दिन पहावत होही, उही बपरा मन जाने. ओ दिन देख न शिवप्रसाद के भंइस हा खाय-पीये ल छोड़ दिस, गर्मी के मारे पोंकत राहय, तब फेर ठेठवार ल बला के ओला देखाइस. तब ओहा बताथे- तोर भंइस ल गरमी मं लू लग गेहे. एक काम कर, कमचिल ल लेस ले, एक पाव सोडा अउ आधा किलो गुड़ सबो ल एक साथ मिंझार के खवा दे तहां ले ठीक हो जाही. ओ दे वइसने करिस तहां ले चार दिन मं ओकर भंइस बने हले-चले ल धर लिस.

अइसने जब आदमी मन ला लू लगथे तहां ले खटिया धर लेथे. हाथ गोड़ कइसे अपने-अपने टूटे असन लागथे. न काम बूता करे के मन होय, न भूख लागे. बस पानी भर ला ढोंकत पियत राहौ. बने बेरा बखत म लू लगे लइका या आदमी के खियाल नइ करे गिस या डॉक्टर बैद नइ बुलाय गिस त आदमी के उल्टा लेय के देय ल पड़ जाथे. ये लू से बचे के खातिर ओ मनखे के बड़ा हिफाजत करना चाही अउ डॉक्टर बैद तुरंत बुला लै.

अइसे गांव मनके सियान बड़ा चेतलग होथे. ओमन लइका सियान, सबो अपन-अपन करधन मं नानचन गोंदली ल बांध ले रथे. कोनो अचान चकरित लू मं खटिया धर लिस त ओला जीरा शक्कर पीस के खवाही, गोंदली ला बने गोरसी के पलपला आगी मं भूंज लेथे तहां ले ओला पानी मं रातभर बोर के बड़े फजर शक्कर के साथ खवाही. अइसने कच्चा आमा ला चार-पांच ठन रोज उसन लिही, अउ ओखर शरबत बना के पियाय. दिनभर घाम में पानी भरे हौला (गुण्डी) ल मढ़ा दे रहिथे संझा होही तहां ले दिन बूड़ते साठ ओही कुनकुन पानी मं नहवां देथे. इकर से लू जात रथे. हमर गंवइहां मन के ये बड़ा सस्ता दवाई ये. अउ कहूं डॉक्टर-बैद करा गेस तब बाप रे जतका के बीमारी नइहे ततका के दवाई सूजी लग जाथे. रुपया-पइसा वाले मन तो भला अइसन ऊंचहा दवाई कर सकत हें, पर जौन रोजी मंजूरी करके खात-कमात हें, जेकर चूल्हा जले के कभू ठिकाना नइ हे, ओमन अपन इही देहाती दवा-दारू मं बीमारी दूर कर लेथे.

दुकालू कथे, बड़ा बैद असन कहां-कहां के दवाई-दारू के बात बता डारे कका. हां भई जेकरे करा गुन रइथे तौने तो ये दुनिया मं पूजाथे. महीं रहि गेंव भकला के भकला. मोर दाई-ददा मन कहिन घला, बने पढ़-लिख रे बाबू बने मास्टर-पटवारी होबे त बने खाबे कमाबे, राज करबे. मोर फुटहा करम में ओ राज करई लिखे राहय तब पढ़ाई-लिखाई होय. मोर नसीब मं तो ”नगरजोत्ता” लिखाय रहिस तेकर सेती पढ़ई गै भाड़ में. आज मोर संगवारी मन ला बने पहिनत-ओढ़त, खात-कमात अउ घुमत-किंजरत देखथौं त मन हा ललचा जाथे. हमर जिंदगी के ठिकाना नइहे का घाम, का छांव, का पानी, का बादर के दिन या का मांघ के कड़कड़ावत जाड़ के महीना सब हमार लेखे एके बरोबर हे. अब चाहे मरन या बाचन, गांव ल छोड़ के कहां जाबो. जाड़-घाम मं तो हमन खेलथन, इकरे से हमर जिंदगी हे. येला डरबो त काम कइसे बनही.

ओ दिन तुंहार इंहा के काकी ह काहत रहिसे, का बाबू! ये पक्की घर का बनगे, गरमी मं तो आगी बरसगे. झट के जुड़ाय के नाव नइ लै. अइसने जाड़ के दिन जुड़ बोलथे. येकर ले तो पहिली कच्ची मकान बने रहिसे तौने बने. जौन गरीब बपरा मन के बने घर-दुवार नइहे छितका कुरिया मन मं रथे ओमन ये गरमी म कइसे राहत होही, उही मन जानै. तभे तो ओकरे लइका-पिचका मन झट ले बीमार पड़थे अउ मर जाथे. न ओकर मन के खाय-पीये के ठिकाना रहे न रहै रहाय के. ओकर मन बर तो भगवाने मालिक हे, उही ह ये गरमी ल सहन करे के शक्ति ओमन ल दै तभी उंकर भला हे नइ तो फेर मरे बिहान हे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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