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छत्तीसगढ़ी म पढ़व- सब्बो झन के एक्केच गोठ, बने राहय मोर जिनगी रोंठ


चलव सबो संस्कार ला जाने सुने के बाद तन मन ला अपन सही जगा मा लगाए बलाए राखव.लगाव होथे तभे सबो बुता अपने अपन सकलावत जावत हे तइसे लागथे.मन मगन राहय अऊ तन मा लगन राहय.फेर धूप-छॉव ला सेहे के ताकत घलो आना चाही.ताकत केहे के मतलब नस्वर संसार मा अपने आप सब नियम ला जानत मानत राहव.

खेल खेलइया के तन मन दुनो स्वस्थ

शरीर अऊ मन दुनों ला काम चाही. जिनगी चलाए बर धन दोगानी लागथे अउ मन चलाए मा नियाव अनियाव मा भेद करे के अनुभो आते रहना चाही जिनगी घलाव एक ठन खेल के हिस्सा होथे स्वस्थ मन ले खेलत रहिबे त सुख दुख दुनो जगा बेवहार मा संतुलन रईही.

रंग मा भंग कोन घोरत हे नइ जानव

बढ़ती अऊ घटती पूंजी पसरा हा रंग मा भंग डारे के काम करथे.तोर बिगाड़ करइया तोर आदत बेवहार ला जानके ओमा भोभा पारे के कोशिस करही. हमेशा सावचेत रेहे रहिबे तभे एमन के चिन्हारी करे पाबे.बनऊकी बनाए बर थुके थुक मा बरा चुरोने वाला के कभी नइये सावचेत राह.चेथी खजुवाए मा नई बनय.पछताए ले पहली बने गिनहा के चिन्हारी करत करत रहना चाही.

आंसो के सात तोरेच हरय

पऊर जेन बीतगे तेन बीतगे.छोड़दे अऊ देखे राख पिछलग्गू झन आए पावय।पाछू डाहर के आंखी तोपाए रहिथे न तो तोला दिखय अउ न आंखी वाला ला दिखय.आज हा आजेच हरय चल चली धरम अऊ करम ला अधार बना के आंसो के साल ला रोंठ लगा बनाए रे उदिम करी तभी गोठियाए अऊ सुधराए के बुता घलो मान पाही.

(मीर अली मीर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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