Homeछत्तीसगढछत्तीसगढ़ी म पढ़व- चउमास के जोरा

छत्तीसगढ़ी म पढ़व- चउमास के जोरा


डोली धनहा के कांटा खूटी ल बीन बांवत बक्खर बर चतवार के एक जघा सकेल के कांटा खूटी के मुंह म आगी लगा के उंकर नाव बूता देथे कांटा खूंटी बिनइया किसनहीन मने मन ए बात के बिनती जरुर करथे कि जब मोर नंगरिया झेंझरी म धान, छेना म आगी लोटा म पानी अऊ हुम बर गुड़ नही ते दसांग धर के नांगर बइला संग आही त ओकर पांव म कांटा झन गड़य सांप बिच्ची ले बिनती करथे हे नाग देव तुंहर मान मनउवा ल पूरा करबोन कोनो किसम के अलहन झन आवय. तभे तो हमर किसानी ह सोला आना होही ताहन फेर देवी देवता ल तिहार म तो मानबे करबोन संगे संग करजा बउड़ी ल घलो छूटबोन.

चउमास के पहिली नदिया नरवा गांव वाले मन के संगे संग सबो मन बरसाती जोरा कर लेथे | बोरा भर नून गड़ा वाले मवेशी खवाए बर, टीपा भर तेल, पठौव्वा म छेना लकड़ी ल रच-रच के भर डरथे. अभी तो बरसात ह तिरीया गे हे कहिके बरसात म मवेशी मन बर गांव-गांव पैरावट के पैरा ल बइला गाड़ी म जोर-जोर के घर के पठौव्वा म भरत जात हे. तीर के कोठार वाले मन बोझा – बोझा घलो डोहार डरथे. धनकुट्टी बाले मन ल तो धान कुटे ले फुरसद नइ हे.

चउमास म किरा मकोरा के भारी डर रथे. भुइयाँ म सुतई ह बने नइ राहे तिही पाए के पहिलीच ले मनखे मन खटिया गांथ डरथे, अभी संझा कांसी के डोरी बर के गुढ़वा बना के मुड़ी म बोही के ढेरा आंटत करको जघा किंजर के घलो आ जथे. अटाये के बाद सुविधा के मुताबिक माचा नही ते बरदखिया खटिया गांथ डरथे. सबो बेवसाय वाले मन अपन अपन धंधा म मगन रथे जइसे भंगई बनइया मन भंदई बनाए म काबर कि किसान ल चिखलही भंदई के जरुरत परथे, केवट मन मछरी फंदोए बर झोल्ली दावन के जुगाड़ म रथे, बढ़ई खटिया के खातिर खुरा पाटी बनाए बर लकड़ी के बेवस्था करथे.

ए सब तो चलत हे फेर अभी गांव के कोनो भी गली म रेंग जव मुंह ह आमा के अम्मट अऊ कुर म मुंह ह पंछा जही. जब मोर मुंह ल लिखते लिखत पंछावत हे त आघु म रही ते ओला खाए बिना थेरे छोड़हू रे भई. दाऊ लाला मन घर तो तीन चार साल के जुन्ना चाँउर खाथे उही किसम ले ऊंकर मन घर आमा के अथान ल घलो पाबे . आमा के अथान घलो धीरे धीरे नंदा जही तइसे लागत हे. आमा ल टोर के पानी म बुड़ो दे. पानी ले हेर हेर के सबसे पहिली ओकर लस्सी ल सरोता म काट ताहन सोजिया के आमा के चार फांकी कर दे. एक झन कांटत हे त लइका मन गोही निकालत हे अउ लइका के दाई ह कुर मेलत हे बढ़िया जीनगी ल चलाए बर. जेकर चटनी जतेक सुहाथे उंकर जिनगी घलो ओतके बढ़िया चलथे. बने सवाद बर आमा ल हरदी म मेल के रौउनीया म सुखो दे. झूराए के बाद ओमा कुर ल कोंच कोंच के भर दे. अइसन चटनी म जाला अऊ कीरा परे के डर नइ राहे. अब तो आमा के कूटी कूटी आठ टुकरा कर के छीदीर बीदीर कर देथे तभे तो मोला अइसे लागथे कि कुर ह चारो फांकी ल एक जघा जोर के संयुक्त परिवार चला डरथे अउ इही आमा के कुटी कुटी होए ले संयुक्त परिवार के अभाव दिखथे तभे तो सियान म कथे के खान पान, वातावरण ह रहन सहन ल प्रभावित करथे.

गांव के भाई मन अभी खइरपा बनाए म मगन हे दीवाल ल बचाए . नांगर, लोहा के संगे संग नाहना जोतार, डोर, खुमरी, मोरा के बेवस्था तो करबे करत हवय फेर थके हरे जीव चैन के नींद सूते बर घर ल टपरे बर परही नहीं ते पानी ह फूटे खपरा डाहर ले चूह के जीना हराम कर देही.

(दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

Tags: Articles in Chhattisgarhi, Chhattisgarhi, Chhattisgarhi Articles

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments