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छ्त्तीसगढ़ी व्यंग्य- लुआठी म तरिया कुनकुन नइ होय


सियान मन कहिथें पहली हमर देश म दूध-दही के नदिया बोहावत रिहिस. हाड़ा टोर कमइय्या रिहिंन. अभो घलो हें, फेर गनती के रहिगे हें. अब घरों-घर गऊ पालन कहाँ होथे. दूध के नदिया सुखागे. जोन दूध होवत हे तेंन गाँव म कम सहर म जादा खपत हे. अब दारू के नदिया म बाढ़ दिखथे. गाँव-लागे न सहर संझा होते साठ दारू म माते मनखे दिख जथें. कोनो-कोनो मन बड़े फजर ले दारू पियत-पियत संझा तक पहुँचथें. दारू-पावर म मनखे गोल घुमथें. देख सकथें के दुनिया गोल घुमत हे. दारू मोहाटी- मोहाटी म पहुँचत हे. घर बाहिर लूटमार, मार-काट, हत्या, होवत हे. छत्तीसगढ़ दारू म घुरत हे. दारूबंदी नइ होय के गम म चुरत हे. दारू के चस्का अउ संगवारी के मस्का जोर मारथे. खोर-खोर म इहाँ दारू-लीला, दारू-गम्मत के धूम-धड़ाका रहिथे. दारू पावर ह मनखे ल शेर बनाथे. पइसा हे त रोजे दारू-तिहार हे, पइसा नइ हे त कोई बात नहीं, जुगाड़ हे. ‘पियो अउ जिय’. दारू-लोंन के गुंजाइश बनत जात हे. कतको हुशियार मनखे मन कहिथें के दारू ह प्रदेश के अर्थव्यवस्था के पावर-हाउस होगे हे. अब दरूवाहा संघ बना के सरकार तीर दारू-लोंन के मांग रखो.

दूध के सुकाल गय:
घरों-घर दूध, दही, मही अउ घी के सुकाल वाले दिन अब गै ? पाउच संस्कृति आ गे. पाउच म दूध. दही, मही, घी अउ पानी मिलत हे. किसम-किसम के पाउच जिहां जाबे उहाँ मिल जही. छत्तीसगढ़ म घर म सगा सोदर के आय ले वोखर गोड़ धोय बर बाल्टी/लोटा म पानी देय के परंपरा हे.ये परम्परा हर नंदावत जात हे. ओखर बाद लोटा गिलास म पिए बर पानी देय जथे. आजकल पाउच वाटर के जमाना हे. येखर बड़े कारोबार हे. पइसा दे पानी खड़े-खड़े पी..अब लइका मन पाउच वाटर पी के बड़े होवत हें. पाउच के पानी ल ज्ञानी मनखे मन मिनरल वाटर कथें. गाँव-गंवई ओन्टा-कोंटा सबे जगा पाउच वाटर जिंदाबाद हे. कोनो नवा नेवरिया मनखे ले लोटा म पानी मांगे के जरूवत नई परे. कोनो भी कार्यक्रम म देखव पाउच वाटर सप्लाई होथे. छोटे –बड़े सबे मनखे पाउच-वाटर पी के कार्यक्रम के शोभा बढ़ाथें.पाउच-वाटर पियाय अउ पिए ले सीना ले सीना चौड़ा हो जथे.

सावन-भादों दारू-दारू
हर दूकान अउ ठेला-ठेला म पानी पाउच मिल जथे. पहिली दूध-दही के नदिया बोहाय. अब दूध पाउच म समागे. पानी पाउच म स्मागे. देश प्लास्टिक में पट्टागे. नकलीपन अउ मिलावट चारों खुंट हे. दारू लाहरा मारत हे. खेती-खार, घर-दुआर बेचा जाय त बेचा जाय फेर दारू अउ फटफटी (मोटर सायकल) होना. दारू गला ले उतरते साठ सरग देखाथे. दारू-परेमी कथें ‘ये बादर परलोखिया ह पानीच बरसाथे कभू दारू बरसातिस त परमानंद होतिस’. बिज्ञान अउ तरक्की करही त बादर ले घलो दारू बरसही. सावन-भादों दारूमय होही. दारू के झड़ी लगही. दारू म नहाव. दारू म डूबको, गाव, नाचो, कूदो, धूम मचाओ. कतेक सुंदर सपना हे.

गोबर से गौ-मूत्र जुग तक
नेशनल हाइवे/स्टेट हाईवे सनसनावत हे. ठलहा गाड़ी दउड़ाव. गउ माता के सेवा करव. फल पाव. गउ माता के पायलागी करके विनती करव हे! गउ माता जादा से जादा गोबर दे. जादा से जादा पानी पीए अउ मूत्र दे. नियाव-योजना के मान रखे. गो-मूत्र के खरीदी शुरू होगे हे. गउ माता ल बिनती करे बर परही के हे! माता तोर मूत्र के बेरा सेट होना चाही. तोर मूत्र ल कोनो चोरा झन लेय. गो-मूत्र के दवा बनही कथें. गोबर-धन’ म नियाव हें. गउ माता !! अब अउ किरपा करव. गोबर-जुग ले गौ-मूत्र जुग तक विकास के गाथा हे. कतको गाय, बइला, भंइसा मन ठलहा घूमत-घूमत सड़क के सुन्दरता ल बढ़ावत हें. दुधारू गाय, भंइस जब तक दूध देवत हे तब तक बने हे. जेन पशु दूध नइ देय तेला कतको पशु पालक छेल्ला छोड़ देथे. इंकर बर न रोका होय न छेंका.

मुड़वा लोटा म पानी
हाँ. पहिली घरों-घर बाल्टी-बाल्टी दूध होय. दूध दुहइया मन दूध दुहत-दुहत हँकर जाँय. लइका, सियान, जवान छकत ले दूध-दही, मही, घी, खांय-पिएं. तंदरूस्त हो जाँय. व्यायाम शाला म दंड पेलें. लोहा कस तन-मन दिखे. तइहे के बात ल बइहा लेगे कथें. अब त जवान लइका मन फांफा कस दिखथें. बेरा के उवत ले सुते रहिथें. पढ़े लिखे लइका मन जादा आलसी होथें. जल्दी उठाबे त खिसिया जथें. अपने दाई-ददा उपर भड़क जथें.

कहाँ के चंदा अउ कहाँ के चंदैनी
रात-रात जाग जाग के पढथें लिखथें. अखाड़ा के जगा जिम आगे. मोबाइल अउ कम्प्यूटर के सेती दिन अउ रात के भेद घटत हे. बड़े-बड़े सहर म रात ह दिन होगे हे . रात म बिजली के चकाचक अंजोर होथे. उहाँ कहाँ के चंदा अउ कहाँ के चंदैनी !! दिन-रात कम्प्यूटर/मोबाइल म लइका-सियान भिड़े रहिथें. कतको झन विदाउट वर्क बिजी दिखथें. व्यायाम-शाला के गौरव नंदागे. लइका मन खेले-कूदे बर भुलागें. स्कूली खेलकूद कागज म हो जथे.. दाई-ददा लइका मन ले डर्रावत दिखथें. सहे-सुहे के ताकत (सहनशीलता) कमती होगे .टीचर मन ल लइका डरूवावत हें. लइका हुमेंले परत हें. टीचर मन कमजोर लइका मन ल अउ ढील देथें, जा रे! धारों-धार बोहा. मुड़वा लोटा म पानी कहाँ ठाहरथे ? कतेक ल सिखोबे ’गंगा नहाय ले गदहा कपिला नइ बनय. उन बड़ भागमान हें जेन ‘गिर परे ले हर हर गंगा’ कहि बइठथें.

मशीन ह दूध ल निचोवत हे
पहिली गाय जने के खुशी म घरों-घर पेंउस बाँटें जाय. घर दुआर, अड़ोस-पड़ोस सब खुश होंयजस-जस गो-वंश बाढ़े तस-तस दूध दही घलो जादा होय. छकत ले दूध, दही, मही, रबड़ी, तस्मई (खीर) खांय-पिएं. सब खुशी जाहिर करंय. अब डेयरी के मशीनीकरन होगे. देश के जनसंख्या एक अरब चालीस करोड़ के तीर हे. बड़े–बड़े डेयरी म सैंकड़ों गाय, भंइस पाले जथे. मशीन ह गाय, भंइस के थन ले दूध तीरथे. डेयरी के मशीन के का मोह अउ का माया. मशीन दूध ल निचो डरथे. खेती-किसानी म बड़े-बड़े डर-डरावन मशीन राक्षस भेस धरे सप्ताह भर के बुता ल घंटों म निपटा देथे. मशीन के सेती उपज बाढ़ीस. माटी के मोह उपर भौतिक-संसार भारी हे. फ्री चाउर खा के कमइया मजूर कोढ़िया होत हे. मजूर रोजे दारू तिहार मनावत हें. बुता नंदावत हे. लबरा मन गेम खेलत हें. बुता बर फिफियावत जोजियावत हें. काम हे, दाम हे फेर मजूर कनमटक नइ देंय. ये डाहर डगर-डगर म दारू हे. वो डाहर नसा मुक्ति के सरकारी अभियान चलत हे. फेर भइया मोर ‘लुआठी म तरिया कुनकुन नइ होय.

(शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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