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RAIPUR BREAKING : एम्स में उपचार नहीं, एम्स के उपचार की जरूरत…..

एम्स में उपचार नहीं, एम्स के उपचार की जरूरत

मरीजों को निजी अस्पताल जाने मजबूर कर रही केंद्रीय स्वास्थ्य संस्थान की व्यवस्था

सांसद सोनी और राज्यसभा सांसद सरोज देख लें कि ये क्या हो रहा है

रायपुर। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) छत्तीसगढ़ के लिए वरदान साबित होगा, यह कल्पना अब बेमानी हो चुकी है। एम्स की व्यवस्था ने इस केंद्रीय स्वास्थ्य संस्थान को ही औचित्यहीन बना देने की जिद सी ठान रखी है।

एम्स में बिना प्रभाव के आम जनता का उपचार तो हो नहीं रहा, बल्कि जनता एम्स के ही उपचार की जरूरत महसूस कर रही है। क्या एम्स से जुड़े जनप्रतिनिधियों को वहां की व्यवस्था अलग चश्मे से दिखाई जाती है

जो वे तमाम अव्यवस्था, स्वेच्छाचारी व्यवहार, मरीजों की अनदेखी, उनके परिजनों से दुर्व्यवहार, मानसिक उत्पीड़न और मरीजों को निजी अस्पताल जाने विवश किये जाने के मामले उन्हें दिखाई नहीं देते।

रायपुर सांसद सुनील सोनी और राज्यसभा सांसद सरोज पांडेय जनता के नुमाइंदे पहले हैं तो उन्हें यह देखना चाहिए कि एम्स में मरीजों के साथ हो क्या रहा है।

इन जनप्रतिनिधियों द्वारा गाहे बगाहे एम्स का अवलोकन किया जाता है लेकिन ऐसा लगता नहीं है कि उन्हें मरीजों की वेदना की कभी एक झलक भी दिखी हो।

यदि ये जनप्रतिनिधि अपने रुतबे के साथ पूर्व नियोजित एम्स भ्रमण की बजाय वहां आम मरीज के परिजन की तरह पहुंचें तो उन्हें अहसास हो जाएगा कि एम्स अपने उद्देश्यों से भटक गया है। वर्षों से जमी व्यवस्था पर जंग लग चुकी है।

कल रात को राजधानी से प्रकाशित अखबार के प्रधान संपादक अपने परिजन को एम्स में उपचार करवाने के लिए गए थे।इनके परिजन की हालत बहुत खराब थी।

जिसके बारे में एम्स डायरेक्टर नागरकर के निज सचिव से बाकायदा चर्चा की गई थी।उनको पेसेंट की सारी स्थिति से अवगत भी कराया गया था।

इनके आश्वासन में दैनिक अखबार के सम्पादक अपने रिश्तेदार को रात के 9.30बजे के आसपास एम्स लेकर पहुचे।जहाँ ईलाज के नाम से केवल खिलवाड़ किया गया।

अरबो रुपयों से निर्मित केंद्र सरकार के इतने बड़े संस्थान में रात के समय वार्ड बॉय का नही रहना समझ से परे है।मरीज के परिजन ही एम्बुलेंस से उनको उतारकर अंदर तक लेकर गए।जब ईलाज में समय बर्बाद कर दिया गया।

तब मरीज को मजबरी वश निजी अस्पताल में जाना पड़ा।आखिरकार क्या किसी भी मरीज के साथ ऐसा दुर्व्यवहार उचित है?

इस मामले पर जिस तरीके से बातें सामने आ रही है वो अपने आप मे समझ से परे है।इस अव्यवस्था से नाराज परिजनों ने जब शिकायत की बात की तो एम्स प्रबंधन के द्वारा उनको ही धमकाने में लग गया।बड़ी बड़ी बातें करने वाले संस्थान की कल रात को पोल खुल ही गयी।

इस घटना की शिकायत के बाद बहुत से लोगो ने अपनी पीड़ा व्यक्त की है।छत्तीसगढ़ के साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर संचालित मीडिया के यूनियन बहुत जल्द देश के स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडविया से भी भेंट करेंगे।

वर्षो से एक ही अधिकारी को एक ही अस्पताल का प्रबंधक बनाना भी समझ से परे है।सूत्रों से मिली जानकारी में हिसाब से रायपुर एम्स में डायरेक्टर को काफी समय से बदला नही गया,

क्या भारत सरकार की तबादला नीति स्वास्थ्य विभाग में शून्य हो जाती है।इस पर भी केंद्रीय मंत्री को मनन करने की आवश्यकता है।

डिसचार्ज रिपोर्ट पर अपनी कलम से ही एम्स प्रबंधन के डॉक्टर ने ही टिप्पणी लिखकर मरीज के परिजन से साइन करवाने की जिद करने लगे।शिकायत होने के भय से अपने आपको सही करने का पूरा फर्जी पेपर भी इनके द्वारा बना लिया गया होगा।

गलती करने वाले अस्पताल के स्टाफ को बचाने की नीयत रखने वाला एम्स एक अच्छा कार्य कैसे करता होगा?एम्स में ऐसी घटना आये दिन होती है,इस पर लोग भय के कारण सामने आकर शिकायत नही कर पाते है।

सरकार को इस अव्यवस्था की ध्यान देने की महती आवश्यकता है।अगर एक समिति बनाकर यहाँ के मामलों की जांच करवाई जाए तो बहुत से मामले सामने आएंगे,

जिसमे अस्पताल प्रबंधन की घोर लापरवाही सामने आएगी। इस बात की चर्चा राजधानी में जोरो पर है।रिपोर्ट कार्ड में मरीज के परिजन एम्स की अव्यवस्था से प्रताड़ित होकर निजी अस्पताल में जाने की बात लिखना चाहते थे

जो कि एम्स के स्टाफ को नामंजूर था।अंततः मरीज के सामने एम्स प्रबंधन ने अपने तरीके से एक रिपोर्ट लिख दी।जिससे नाराज होकर मरीज के परिजन साइन करने से मना कर दिया।

इस घटना की शिकायत को लेकर मीडिया संपादक ने एम्स के डायरेक्टर से भी बात की पर कोई भी समाधान नही पाया।उल्टा डायरेक्टर के पीए ने मरीज के परिजन को अपने मोबाइल से कॉल करके अस्पताल प्रबंधन की खूब तारीफे की,साथ ही पीड़ित परिजन अखबार के संपादक को ही धमकाने लगे।

आप मीडिया वाले हो क्या कुछ भी लिखोगे आपके खिलाफ शिकायत करेंगे।झूठे मामले की शिकायत बनवाकर धमकाने का काम भी अब इनके द्वारा किया जा सकता है।

इन्होंने एक शिकायत भी बनाकर व्हाट्सएप की है जिसमे ये महाशय खुद ही फंस रहे है।फर्जी शिकायत बनवाकर डराने का काम करने में इनको महारत हासिल भी है।

अपने गिरेबान में देखने के अलावा पीडित परिवार को ही डराने का काम किया जाना पूरी तरह से अनुचित है।केंद्र सरकार को रायपुर एम्स के संचालकों के ऊपर कड़ी कार्यवाही करने की आवश्यकता है।जब मीडिया वालों के साथ एम्स प्रबंधन ऐसा दुर्व्यवहार कर सकता है तो आम जनता के साथ इनका व्यवहार कैसा होगा?

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