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युद्ध का असर या मुनाफाखोरी का खेल? बस्तर में यूरिया “सोने के भाव”

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बस्तर : सम्यक नाहटा : ईरान-इजराइल युद्ध की आंच अब बस्तर के खेतों तक पहुंच चुकी है। यूरिया की किल्लत ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि खाद अब “सोने के भाव” बिक रही है और किसान सबसे ज्यादा परेशान है।

इस पूरे खेल में अब सवाल केवल स्थानीय डीलरों तक सीमित नहीं रहा। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार किसानों और रिटेलर्स के बीच यह चर्चा तेज है कि देश की बड़ी उर्वरक कंपनियां, जैसे National Fertilizers Limited (NFL), की सप्लाई और पॉलिसी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

आरोप यह है कि कंपनियां यूरिया के साथ जबरन “लदान” (महंगी दवाइयों/प्रोडक्ट्स का पैकेज) जोड़ रही हैं। एक गाड़ी यूरिया के साथ करीब 2 लाख रुपये तक का अतिरिक्त माल थमा दिया जाता है। ऐसे में—

  • बड़े डीलर अपनी लागत निकालकर बच जाते हैं

 

  • रिटेलर महंगे में खरीदने को मजबूर होता है

 

  • और अंत में किसान को ऊंचे दाम चुकाने पड़ते हैं

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब कार्रवाई होती है, तो सिर्फ छोटे रिटेलर्स पर—जबकि पूरा सिस्टम बड़े स्तर पर काम कर रहा होता है।

अब बड़ा सवाल यह है—

क्या इस पूरे खेल में केवल छोटे दुकानदार ही दोषी हैं?

या फिर सप्लाई चेन के बड़े खिलाड़ी, डीलर और कंपनियों की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?

किसानों की मांग साफ है—

यूरिया की कालाबाजारी पर रोक लगे, “लदान सिस्टम” की जांच हो और बड़ी कंपनियों व डीलरों की भूमिका की पारदर्शी जांच हो।

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