सम्यक नाहटा : जगदलपुर। चुनाव के समय पार्टी का झंडा उठाने वाले, हर कार्यक्रम में सबसे आगे रहने वाले और वर्षों तक संगठन के लिए समर्पित भाव से काम करने वाले अमर झा आज खुद जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं। जिला न्यायालय के सामने पान ठेला लगाकर परिवार का पालन-पोषण करने वाले अमर झा पिछले लगभग दो वर्षों से वन-साइड पैरालिसिस (लकवा) से पीड़ित हैं। गंभीर बीमारी के बावजूद वे रोज़ अपने ठेले पर बैठने को मजबूर हैं, क्योंकि यही उनके परिवार की रोज़ी-रोटी का एकमात्र सहारा है।

अमर झा का आरोप है कि उन्होंने वर्षों तक पार्टी के नेताओं से एक स्थायी दुकान और इलाज के लिए आर्थिक सहायता की मांग की, लेकिन उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उनका कहना है कि क्षेत्रीय विधायक ने व्यक्तिगत स्तर पर मदद की, परंतु पार्टी संगठन से जिस संवेदनशीलता और समर्थन की उम्मीद थी, वह अब तक दिखाई नहीं दिया।
अब उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। नयापारा से गांधी मार्ग तक प्रस्तावित सड़क चौड़ीकरण के चलते उनका पान ठेला हटने की आशंका है। यदि ऐसा हुआ, तो बीमारी से जूझ रहे अमर झा के सामने रोज़गार का अंतिम सहारा भी खत्म हो जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वर्षों तक पार्टी के लिए मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं की कीमत सिर्फ चुनाव तक ही सीमित है? क्या एक समर्पित कार्यकर्ता की पुकार सत्ता और संगठन तक नहीं पहुँच रही? क्या पार्टी अपने ही पुराने कार्यकर्ता के पुनर्वास, स्थायी दुकान और इलाज की जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आएगी?
अमर झा की कहानी केवल एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं, बल्कि उन हजारों जमीनी कार्यकर्ताओं की पीड़ा का प्रतीक है, जो वर्षों तक संगठन के लिए काम करते हैं और कठिन समय में खुद को अकेला महसूस करते हैं।
अब निगाहें भाजपा संगठन पर हैं। क्या पार्टी अपने पुराने कार्यकर्ता के साथ खड़ी होगी, या फिर यह पुकार भी अनसुनी रह जाएगी?
नोट: इस संस्करण में “अमर झा का आरोप है” और “उनका कहना है” जैसे वाक्यांश जानबूझकर रखे गए हैं, ताकि आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत न किया जाए और रिपोर्ट संतुलित रहे।
Author: RashtraVadi News
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