उन्नत गौशाला में वैज्ञानिक पशुपालन शिविर आयोजित, विद्यार्थियों और पशुपालकों को दिए गए आधुनिक प्रबंधन के गुर

जगदलपुर। बारिश का मौसम पशुपालकों के लिए जितनी राहत लेकर आता है, उतनी ही बड़ी चुनौतियां भी खड़ी करता है। बढ़ती नमी, जलभराव, कीचड़, खराब चारा और संक्रामक बीमारियों के बढ़ते खतरे के बीच पशुधन की सुरक्षा बेहद जरूरी हो जाती है। इसी उद्देश्य से शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुम्हरावंड की उन्नत गौशाला में वैज्ञानिक पशुपालन शिविर आयोजित किया गया। शिविर में विद्यार्थियों और पशुपालकों को बरसात के दौरान पशुओं की देखभाल, रोगों से बचाव और वैज्ञानिक पशुपालन की व्यावहारिक जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में सहायक प्राध्यापक (पशुधन उत्पादन प्रबंधन) डॉ. नीता मिश्रा ने कहा कि बस्तर जैसे ग्रामीण एवं आदिवासी अंचल में पशुपालन हजारों परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में पशुओं का स्वस्थ रहना सीधे तौर पर पशुपालकों की आय और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा है। बारिश के मौसम में थोड़ी सी लापरवाही भी पशुधन के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
जलभराव और गंदगी से बढ़ता है बीमारी का खतरा
डॉ. मिश्रा ने बताया कि बरसात में पशुशाला में जलभराव सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। पशुशाला का फर्श ऊंचा और पर्याप्त ढलान वाला होना चाहिए, ताकि पानी और मलमूत्र की आसानी से निकासी हो सके। लगातार गीली और कीचड़युक्त जगह पर पशुओं को रखने से खुर रोग, त्वचा संक्रमण सहित कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए पशुशाला की नियमित सफाई, सूखा बिछावन और पर्याप्त वेंटिलेशन बेहद जरूरी है।
उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में गलघोटू, लंगड़ा बुखार, खुरपका-मुंहपका, एंथ्रेक्स, पीपीआर, एंटरोटॉक्सीमिया, स्वाइन फीवर, रानीखेत और मरेक जैसी संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इनसे बचाव के लिए समय पर टीकाकरण सबसे प्रभावी उपाय है। पशुपालकों से सरकारी टीकाकरण अभियानों में भाग लेकर अपने पशुओं का अनिवार्य रूप से टीकाकरण कराने की अपील की गई।
सड़ा-गला चारा बना सकता है पशुओं को बीमार
शिविर में पशु आहार और पोषण प्रबंधन पर भी विशेष जानकारी दी गई। डॉ. मिश्रा ने कहा कि पशुओं को अत्यधिक गीला, सड़ा-गला या फफूंद लगा चारा बिल्कुल नहीं खिलाना चाहिए। केवल हरे चारे पर निर्भर रहने के बजाय सूखे चारे, दाना मिश्रण, खनिज लवण और नमक का संतुलित मात्रा में उपयोग करना चाहिए। पशुओं को हर समय स्वच्छ एवं ताजा पानी उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
दुग्ध उत्पादन करने वाले पशुओं में थनैला रोग से बचाव के लिए दुग्ध दोहन के दौरान थनों और बर्तनों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी गई। वहीं नवजात बछड़ों, मेमनों और चूजों को ठंड एवं नमी से बचाने के साथ जन्म के तुरंत बाद पर्याप्त मात्रा में खीस पिलाने को उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया गया।
आकाशीय बिजली और तेज बारिश में पशुओं को रखें सुरक्षित
डॉ. मिश्रा ने पशुपालकों से अपील की कि तेज बारिश और आकाशीय बिजली के दौरान मवेशियों को खुले में बिल्कुल न छोड़ें। किसी पशु में सुस्ती, तेज बुखार, लंगड़ापन, मुंह में छाले या दूध उत्पादन में अचानक कमी जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे तत्काल अन्य पशुओं से अलग कर नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
शिविर का संदेश स्पष्ट रहा—वैज्ञानिक पशुपालन, समय पर टीकाकरण और नियमित देखभाल ही पशुधन को सुरक्षित रखने के साथ पशुपालकों की आजीविका को मजबूत बनाने की सबसे बड़ी कुंजी है।
Author: RashtraVadi News
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