धनकुल की धुन पर पांच से सात दिन तक गूंजती है महादेव, बालीगौरा की कथा

धनकुल की धुन पर पांच से सात दिन तक गूंजती है महादेव, बालीगौरा की कथा

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बस्तर में तीजा जगार की अनूठी परंपरा, नवविवाहित दंपति के व्रत से जुड़ी महिलाओं की आस्था और लोकसंस्कृति

जगदलपुर (बस्तर)। छत्तीसगढ़ में तीजा तिहार श्रद्धा, आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है। प्रदेश के अलग-अलग अंचलों में तीज पर्व की अपनी विशिष्ट मान्यताएं और परंपराएं हैं, लेकिन आदि संस्कृति और लोकपरंपराओं से समृद्ध बस्तर में तीजा का स्वरूप कुछ अलग ही दिखाई देता है। यहां धाकड़ समाज में तीज पर्व को ‘तीजा जगार’ के रूप में मनाने की परंपरा है। यह केवल एक व्रत या पूजा का अवसर नहीं, बल्कि लोकगीत, पारंपरिक वाद्य, कथा, सामूहिक पूजा, जागरण और महिलाओं की सक्रिय सहभागिता से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है।

धाकड़ समाज में नवविवाहित दंपति को तीज व्रत की उपासना और इस परंपरा से जोड़ने के उद्देश्य से तीजा जगार का आयोजन किया जाता है। इस दौरान परिवार की व्रती महिलाएं एक ही स्थान पर एकत्र होकर सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं। तीजा जगार की परंपरा पांच से सात दिनों तक चलती है। इस अवधि में गुरुमाय अर्थात पारंपरिक रूप से पूजा-अनुष्ठान और जगार गीतों का संचालन करने वाली महिलाएं तथा उनकी सहायक गुरुमायें धनकुल वाद्य की धुन पर पारंपरिक गीत गाते हुए देवी-देवताओं का आह्वान करती हैं। देवी-देवताओं के भजन को स्थानीय रूप से ‘चाखना’ कहा जाता है। लोकमान्यता के अनुसार जगार गीत और चाखना के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है और उन्हें नृत्य कराया जाता है।

तीजा जगार के लिए पूजा स्थल को भी विशेष पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है। बांस की कमचियों को चौकोर आकार में बांधकर उसके ऊपर नया कपड़ा अथवा साड़ी ढककर फुलेरा तैयार किया जाता है। इसी फुलेरा में चेंडू लगाया जाता है। फुलेरा के नीचे चावल, आटा और हल्दी से पारंपरिक मांडना तैयार किया जाता है। इसके ऊपर पीढ़ा रखा जाता है और पीढ़े पर बालीगौरा वाला परात स्थापित किया जाता है। इस पूरी व्यवस्था में स्थानीय सामग्री और पारंपरिक विधि का उपयोग बस्तर की लोकसंस्कृति और प्रकृति से जुड़े जीवन की झलक प्रस्तुत करता है।

तीजा जगार की पूजा में सबसे पहले गौरी-गणपति की पूजा की जाती है। इसके बाद भगवान शंकर और माता पार्वती की विशेष पूजा-अर्चना होती है। भगवान शंकर को कनेर के फूल, बेलपत्र आदि अर्पित किए जाते हैं, जबकि माता पार्वती को मदार के फूल सहित अन्य पुष्प और श्रृंगार सामग्री चढ़ाई जाती है। फूल, अक्षत, धूप, दीप, कलश और फल आदि से पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा की एक महत्वपूर्ण परंपरा में परात में रखे बालू को दो भागों में बांटकर शिव और पार्वती के प्रतीक स्वरूप तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन्हीं प्रतीकों की उसी पूजा स्थल पर विधि-विधान से पूजा की जाती है।

तीजा जगार की सबसे विशिष्ट पहचान धनकुल वाद्ययंत्र है। मिट्टी के मटके के ऊपर सूपा और सूपा के ऊपर तीर रखकर पारंपरिक तरीके से धनकुल तैयार किया जाता है। इसे बांस की झिरनी काड़ी से बजाया जाता है। धनकुल की विशेष लय के साथ गुरुमायें और उनकी चेलियां महादेव और बालीगौरा की कथा तथा पारंपरिक जगार गीतों का गायन करती हैं। धनकुल वाद्य के विशेष उपयोग के कारण तीजा जगार को कई स्थानों पर ‘धनकुल’ के नाम से भी जाना जाता है। इसकी धुन के साथ गूंजते लोकगीत तीजा जगार के वातावरण को पूरी तरह पारंपरिक और लोकमय बना देते हैं।

जागर के दौरान महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। व्रती महिलाएं रातभर जागकर अखंड ज्योत की रक्षा करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि दीपक बुझने न पाए। आरती के बाद भजन-कीर्तन और पारंपरिक गीतों का क्रम जारी रहता है। बालीगौरा को सिर पर धारण कर पूजा स्थल तक लाने की भी परंपरा है। तीज व्रत रखने वाली कोई महिला, नवविवाहिता, पहली बार तीज व्रत रखने वाली कुंवारी अथवा परिवार की अन्य व्रती महिला बालीगौरा को सिर पर रखकर घर से पूजा स्थल तक लेकर आती है। इसी प्रकार दीपयुक्त कलश को भी एक महिला सिर पर धारण कर पूजा स्थल तक लेकर आती है। इस परंपरा में महिलाओं की आस्था के साथ उनकी जिम्मेदारी और सामूहिक सहभागिता भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

जागर की अवधि पूरी होने के बाद अंतिम चरण में महादेव-बालीगौरा की पूजा, आरती, भजन-कीर्तन और अन्य पारंपरिक विधियां संपन्न की जाती हैं। परात में रखे बालू से बनाए गए शिव-पार्वती के प्रतीकों की पूजा की जाती है तथा फूल, अक्षत, धूप, दीप, कलश और फल अर्पित किए जाते हैं। अंतिम आरती और पारंपरिक पूजा-विधि के साथ पांच से सात दिनों तक चलने वाले तीजा जगार का समापन होता है।

गुरुमाय गोमती ठाकुर एवं मंदना ठाकुर तथा सहायक गुरुमाय पद्मनी ठाकुर ने बताया कि धाकड़ समाज में तीजा जगार की यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। इसमें नवविवाहित दंपति के तीज व्रत के साथ परिवार की सभी व्रती महिलाओं की सामूहिक सहभागिता को विशेष महत्व दिया जाता है। गुरुमायों द्वारा गाए जाने वाले पारंपरिक जगार गीत और धनकुल की धुन के माध्यम से समाज की लोकमान्यताओं और देवी-देवताओं से जुड़ी कथाएं नई पीढ़ी तक पहुंचती हैं।

बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बीच भी तीजा जगार जैसी परंपराएं बस्तर की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। फुलेरा, चेंडू, मांडना, बालीगौरा, अखंड ज्योत, महादेव-पार्वती की पूजा, धनकुल की धुन और गुरुमायों के पारंपरिक जगार गीत इस लोकपर्व को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं। खास बात यह है कि इस पूरी परंपरा को जीवित रखने में महिलाओं की भूमिका सबसे प्रमुख है। वे व्रत और पूजा-अर्चना के साथ लोकगीत, कथा, पारंपरिक विधि और सांस्कृतिक ज्ञान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई हैं।

धाकड़ समाज की तीजा जगार इस तरह केवल तीज व्रत की धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि बस्तर की लोकआस्था, महिलाओं की सामूहिक सहभागिता, लोकगीत और पारंपरिक वाद्य संस्कृति से जुड़ी जीवंत विरासत है, जिसकी धुन में आज भी पीढ़ियों पुरानी सांस्कृतिक स्मृतियां सुनाई देती हैं।

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Author: RashtraVadi News

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