सम्पादक डेस्क : लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनावों में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक मीडिया में निहित होती है। यही कारण है कि मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। उसका धर्म सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना, सच्चाई को उजागर करना और जनता की आवाज़ को बुलंद करना है।

जब मीडिया अपने मूल कर्तव्य से भटककर किसी एक विचार या सत्ता का उपकरण बन जाता है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में सच दब जाता है, आधी-अधूरी जानकारी जनता तक पहुँचती है और जनमत का संतुलन बिगड़ जाता है। परिणामस्वरूप लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाता है, जिसमें वास्तविक जवाबदेही का अभाव दिखने लगता हहालांकि यह भी सच है कि पूरा मीडिया एक रंग में रंगा हुआ नहीं है। आज भी कई पत्रकार और संस्थान ऐसे हैं जो तमाम दबावों के बावजूद सच के साथ खड़े हैं, कठिन सवाल पूछते हैं और जनहित को सर्वोपरि रखते हैं। लेकिन दूसरी ओर, कुछ मंचों पर पत्रकारिता के नाम पर शोर, पक्षपात और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलना एक गंभीर चिंता का विषय है।
मीडिया की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि वह हर सत्ता से—चाहे वह किसी भी दल या विचारधारा की क्यों न हो—एक समान दूरी बनाए रखे और निष्पक्षता के साथ प्रश्न पूछे। सरकार के अच्छे कार्यों की सराहना करना जितना आवश्यक है, उतना ही जरूरी उसकी गलतियों को उजागर करना भी है। यही संतुलन लोकतंत्र की आत्मा है और यही सच्ची पत्रकारिता की पहचान।
एक सशक्त और निष्पक्ष मीडिया ही सरकारों को जवाबदेह बनाता है, संस्थाओं को मजबूत करता है और जनता के विश्वास को कायम रखता है।
अंततः, लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि मीडिया सत्ता के साथ खड़ा है या जनता के साथ। क्योंकि जब मीडिया जनता का प्रहरी बनकर खड़ा होता है, तभी लोकतंत्र वास्तव में जीवंत, जागरूक और मजबूत बनता है।
Author: RashtraVadi News
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